रिश्ते नहीं जमीन या आसमान से
लगते हैं आज आदमी टूटे मकान से
सड़कों पे घूमता है बेजुबान दर्द
वीरान चौक लग रहे रेगिस्तान से
बाजार में पड़ी है लाश बेकफन
लोग देखते खड़े हैं कपड़े दुकान से -
किस कला में शामिल कपड़े उतारना
पूछेंगे यह सवाल हम जीनत अमान से
बोकर के स्वेद खेत में आँसू बटोरना
खाते बही उधार के कहते किसान से
है यकीन अब भी निकलेगा कोहनूर
कोयले निकल रहे हैं जिस खदान से
:-:- बसंत देशमुख -:-:-
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