दो हरफ भी अगर पढ़े होते

दो हरफ भी अगर पढ़े होते 
भाँति औरों के तुम बड़े होते

आगे गैरों के हाथ फैलाते- 
क्यों नहीं पाँव पर खड़े होते

रोशनी राह में बिखर जाती 
तुम अंधेरों से गर लड़े होते

मंजिलें सामने खड़ी मिलती 
दो कदम और यदि बढ़े होते

वक्त की नब्ज को परख लेते 
क्यों ये दिन देखने पड़े होते

आरजू थी तुम्हारी आँखों में 
बनके काजल कभी चढ़े होते

उनकी राहों में सैरगाहों की 
मील पत्थर से हम गड़े होते

ये भी सच है नसीब में सब के 
हीरे  मोती  नहीं  जड़े  होते


:-:- बसंत देशमुख -:-:-

कोई टिप्पणी नहीं: