हर जगह गड़बड़ घोटाला है

हर  जगह   गड़बड़   घोटाला  है
भीतर   काम  बाहर    ताला   है

हाथ  काले   थे   जिनके धंधे में
आज   उनके गले  में   माला है

टूटे   पुल की   यही   गवाही   है
राख  और  रेत  का   मसाला  है

बाढ़  आयी  हुई  है   नदियों  में
सूखा   कैसे  पड़ा  ये   नाला   है

रोशनी   सूर्य    की    उधारी   है 
ये वहम  जुगनुओं   ने  पाला है 

रास्ता  तय किया  है  जनता ने 
और    नेता   के   पाँव  छाला है 

देखें फसेंगी मछलियाँ  कितनी 
ताल  में  हमने   जाल  डाला  है 

हर  तरफ  उनका  बोलबाला  है 
इधर  साढू   तो  उधर  साला  है

अधो वस्त्र  रेशमी पहन  के  वह 
ऊपर से  ओढ़ता  मृग  छाला  है 

आफतें    बार    बार    आयेंगी- 
रास्ता   तो    देखा     भाला   है

कोई  आता   है   कोई  जाता  है 
ये  घर   है   या   धरमशाला   है

चोर   डाकू  हुए  हैं   छात्र   सभी
शहर  में    कैसी   पाठशाला   है

व्यंग  के  हाथों  में  छुरा  होता है
मीठे  लफ्जों  में  उनके  भाला है

उनको शायरी  का  शौक  चर्राया
ऊपर   वाला   अब   रखवाला  है


:-:- बसंत देशमुख -:-:-

कोई टिप्पणी नहीं: