ये गीतों के दालान गजलों की छत है


छोटे  लिफाफे  में  छोटा  सा  खत  है
लोगों  ने  मजमून  भाँपा गलत  है --

पैदा   हुए    हैं   झुकी   रीढ़   लेकर --
समझो  न  माथा  सलामी में  नत  है

हमें  देखकर झर गया, आँख  से  जो
खुशियों का है अर्क, जीवन का सत है

जहाँ  ढेर  बारूद का हमने  समझा --
वहाँ राख पर खाक की  बस  परत  है 

जरा  ढूंढकर  देखिए  आप  भी  तो 
छिपा राजहंसों  में  बगुला  भगत है

भटके हुए रास्तों  से  गुजरकर  अब 
मंजिल पर  आरोप  मढ़ना  गलत है 

लखन राम को मिल गए हैं बहुत पर 
ढूंढे  से  मिलता  ना  भाई  भरत  है

तराशी   गई   दर्द   की   छैनियों  से 
ये गीतों के दालान गजलों की छत है


 -:-:- बसंत देशमुख -:-:-

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