भरी माँग में जूही चम्पा
मादक खुशबू साँस में
मादक खुशबू साँस में
बौरायी है हवा बावली
भरे हुए चौमास में
मेंहदी और महावर के दिन
लौटे फिर से गाँव में
बोल छुपे अधरों के भीतर
बोल छुपे अधरों के भीतर
पायल बोले पाँव में
अधरों पर मोहक मुस्कानें
आँखें तो वाचाल हैं
सूत्र जुड़े किस समीकरण से
ढूँढ़ रहे बैताल हैं
आँखें तो वाचाल हैं
सूत्र जुड़े किस समीकरण से
ढूँढ़ रहे बैताल हैं
लहरें गिरीं, उठीं फिर गिरकर
एक अनोखे दॉँव से
नदी शरारत पे उतरी है
एक पुरानी नाव सेदिन की अगवानी चुंबन से
कटे रात भुजपाश में
साँस साँस में आग लगी है
कटे रात भुजपाश में
साँस साँस में आग लगी है
भरे हुए चौमास में
:-:- बसंत देशमुख -:-:-
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