शब्दों के सौदागर ठहरे
रचनाकार नहीं
रच डाले वे ग्रंथ भले ही
रच डाले वे ग्रंथ भले ही
पर फनकार नहीं
उड़ते हैं चिंतन में ऐसे
जैसे नभ पर चील
शब्दों के अजगर अर्थों के
चूजे जाते लील
शब्दों के अजगर अर्थों के
चूजे जाते लील
कलमें कुछ संकल्प उगायें
तो फिर बात बने
वरना डर है हो जाये ना
बंटाधार कहीं
तो फिर बात बने
वरना डर है हो जाये ना
बंटाधार कहीं
स्वागत उन रचनाओं का यदि
बेबाक बयानी हो
या समाज का दर्द छुपाये
अमिट कहानी हो
बेबाक बयानी हो
या समाज का दर्द छुपाये
अमिट कहानी हो
सड़ी व्यवस्था को झकझोरे
गहरे वार करे
वरना वे रचना कहलाने के
गहरे वार करे
वरना वे रचना कहलाने के
हकदार नहीं
:-:- बसंत देशमुख -:-:-
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें