हँसी खुशी सब राजी भी है
थोड़ी सी नाराजी भी है
कुछ बातें हो गयी पुरानी
और बहुत कुछ ताजी भी है
और बहुत कुछ ताजी भी है
ऊपर ऊपर मेलजोल है-
भीतर में गुटबाजी भी है
भीतर में गुटबाजी भी है
आपस में यदि झगड़े होते
सुलझाने को काजी भी है
सुलझाने को काजी भी है
दाल भात में मूसरचंदी-
बात बात में हॉजी भी है
नैया को मझधार डुबोकर
तरने वाले माँझी भी हैं
हंसो की टोली में छुपकर
रहता बगुला पाजी भी है
:-:- बसंत देशमुख -:-:-
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