जिन्दगी में गमों के साये हैं
आप की दी हुई सजायें हैं
आप की दी हुई सजायें हैं
उनकी आँखों के नूर थे कभी
आज हम हो गये पराये हैं
आज हम हो गये पराये हैं
आँख नदियों के हैं मुहाने से
मन में पर्वत सी वेदनायें है
होंठ पर है हँसी समाधि लिए
कंठ में विष भरी ऋचायें हैं
जिसकी गुम्बद को आपने देखा
उसकी हम नींव की शिलायें हैं
जाने बदलेंगे कब हकीकत में
अभी कागज पे योजनायें हैं
अभी कागज पे योजनायें हैं
आज कविता में कहाँ दर्शन है
वक्त की दी हुई जफायें हैं
वक्त की दी हुई जफायें हैं
गीत कहते हैं जिन्हें झरनों का
पर्वतों की अकथ व्यथायें हैं
इनके चेहरों को गौर से पढ़िये
बेबसी की लिखी कथायें हैं
तरजनी दाँत में दबाये हैं-
आज बालिग हुई अदायें हैं
:-:- बसंत देशमुख -:-:-
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