भावनायें शब्द ढूँढ़ती
व्यक्त होने कोई गीत में
आस्थायें ठौर माँगती
कुर्सियों की राजनीति में
हर गली बदल गयी बजार में
बिक रहा सतित्व भी उधार में
डोलियों की खैर अब मनाइए
चोर सब बदल गए कहार में
ये वर्तमान आँख मूंदकर
झाँकने लगा अतीत में
धर्मं की सजी हुई दुकान है
है रहन यहाँ सभी की जान है
लोग बंट गये सभी गिरोह में
आदमी तो बन गया कृपाण है
नफरतों को कौन दे गया
बो रहा है कौन प्रीत में
बो रहा है कौन प्रीत में
हारकर जमीन से जुआँ
आसमाँ ने पी लिया धुआँ
सूख गयी पुण्य की नदी
भर गया है पाप का कुआँ
आस्था नहीं है नीति में
और भय नहीं अनीति में
काटते हैं तर्क को कुतर्क
ओहदों में रिश्वतों का फर्क
मछलियों को खा रही मछलियाँ
मछलियों को खा रहे हैं सर्प
अब कुरीतियों के मापदंड
ढल गये सभी है रीत में
लग चुका है सूर्य को ग्रहण
और दिन में रात हो चुकी
एक चाल क्या गलत हुई
जीती बाजी मात हो चुकी
एक हार अन्तराल में
फिर बदल न जाये जीत में
:-:- बसंत देशमुख -:-:-
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