सियासत पे लिखी गयी ये गजल है

सियासत पे लिखी गयी ये गजल है 
कागज पे बोयी गयी ये फसल है-

कपड़ों पे नकली तमगे सजाकर
पुड़िया अकल की बेचती नकल है

ताजे लहू ने दी सड़क पर गवाही
रहबर व रहजन की एक सी शकल है

मौसल में सन्नाटा जो डोलता है
तूफान की भूमिका दरअसल है-

खैर अब मनाये भेड़ों की अम्मा 
गांव में घुसा अब भेड़ियों का दल है

निकलने को बाहर तलाशें सुरंगें 
जलने को फिर लाख का इक महल है

न कलम तोड़ देना न दावात ही को 
मुर्दा अभी तक नपुंसक नसल है


:-:- बसंत देशमुख -:-:-

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