साथ उनकी सदा दुआयें हैं
जितना पाये सभी गँवायें हैं
अपने जूड़े में खोंचकर बिजली
झोपड़ी पर झुकी घटायें हैं
उनके घूंघट ही अधिक हैं लम्बे
जिनने गुल सैकड़ों खिलाये हैं
मुफ्त बदनाम हो गया मौसम
दरअसल बदचलन हवायें हैं
बाद मरने के बुत खड़ा करना
कबसे प्रचलित हुई प्रथायें हैं
सोचकर रास्ता जरा चुनिये
आजकल दिग्भ्रमित दिशायें हैं
शब्द दहकेंगे बनके अंगारे-
मत कहो सिर्फ कल्पनायें हैं
:-:- बसंत देशमुख -:-:-
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