सबको पापी पेट का सवाल है

सबको पापी पेट का सवाल है 
आदमी लगने लगा दलाल है।

झोपड़ी का और पट्टा ले लिया 
उनकी पहले ही किराया चाल है

वैसे खिचड़ी पक नहीं पाती कभी 
किन्तु गल जाती हमेशा दाल है

एक पिंजरा है सलाखों से बना 
द्वार पर जिसके सुनहरा पाल है

बंदगी से घोर नफरत है कहीं 
दंडवत मुद्रा कहीं पर ढाल है

उनकी चुप्पी भी गजब ढाकर रही 
मौन वाणी से अधिक वाचाल है।

पैसे कंकड़ की तरह हैं फेंकते - 
उनके घर में क्या कोई टकसाल है

डूब मरने को था चुल्लू भर बहुत 
किन्तु कम पड़ने लगा अब ताल है

देश तो है एक जुएँ घर की तरह 
जिसमें नेताओं को मिलता नाल है

मौत का अंजाम दिलकश हो कहीं 
जिन्दगी तो जान का जंजाल है

और ज्यादा क्या कहें बेहाल हैं 
जिन्दगी तो सिर कटा बैताल है

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