लोग पढ़ने लग गये थोथी कथायें
कौन बाँचे प्रेमचंदो की ऋचायें
डिग्रियाँ लेकर भटकती है जवानी
किसको फुर्सत अब पढ़े कविता कहानी
स्वार्थ की अंधी हवायें बह रही हैं
दास्ताँ बरवादियों की कह रही हैं
दास्ताँ बरवादियों की कह रही हैं
देश चर्चित था कभी कुरबानियों से
अब तो आतंकित हुआ अपराधियों से
गीत चोली का फिजाँ में गूंजता है
सर छुपाने शील अब घर ढूंढता है
बुझ गयी कलमें कई शोले उगलकर
बुझ गयी कलमें कई शोले उगलकर
चिन्तकों की भीड़ है चोले बदलकर
गीत गजल लिख के बोलो क्या करोगे
क्या निराला की तरह घुटकर मरोगे
वक्त अभी साहित्य से चेता कहाँ है
बोल तुलसीदास का त्रेता कहाँ है
:-:- बसंत देशमुख -:-:-
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