लगने लगी है जिंदगी मझधार की तरह

निकले थे घर से नंगी तलवार की तरह 
लौटे हैं शाम को फटे  अखबार की तरह 

आँखों में चंद सपने  कल के  सँजो रखे 
उनको सँवारना  है  घर  बार  की  तरह 

हाथों से डोर उम्र की अब  फिसल  चुकी 
लगने लगी है जिंदगी मझधार की तरह 

कश्ती  है डूबने  को साहिल  भी  दूर  है 
हाथों  से  काम  ले  लूँ पतवार की तरह 

रिश्तों की एक  बस्ती  आबाद  है  यहाँ 
लगते हैं लोग मुझको परिवार की तरह 

तुम ही बताओ तुम से कैसे मिलूँ  कहाँ 
दुनिया खड़ी है बीच में दीवार की  तरह 

इन्सान  की  तरह जरा जीने की चाह है 
मरना है एक दिन मुझे फनकार की तरह

:-:- बसंत देशमुख -:-:-

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