समुन्दर किनारों से क्या माँगता है
वो टूटे किनारों से ये पूछ लेना
किसके मुकद्दर का टूटा सितारा
किसके मुकद्दर का टूटा सितारा
वो टूटे सितारों से ये पूछ लेना
अगर गोद धरती की सूनी पड़ेगी
वो फिर से फरिस्तों से भरती रहेगी
उजड़े - चमन की हर इक शाख पर
नयी नित्य कलियाँ संवरती रहेगी
मगर क्या वीराने उजड़ते रहेंगे
ये काँटों को भी क्या तरसते रहेंगे
ऐसी वीरानों से क्या बेरुखी है
ऐसी वीरानों से क्या बेरुखी है
वो रूठी बहारों से ये पूछ लेना
ये ऊँची हवेली गगन चूमती है
खुशियाँ निरन्तर चरण पूजती है
वहीं एक कुटिया खड़ी सर झुकाये
सारी उमर भर कफन ढूँढ़ती है
ये अमीरी गरीबी की ऊँची दीवारें
गिरती नहीं क्यों पड़ी जब दरारें
ये मजहब के दंगे कहाँ तक चलेंगे
क्या ये वतन को मिटाकर रहेंगे
वतन के शहीदों की क्या थी तमन्ना
वो रोते मजारों से ये पूछ लेना
अभी देव कुटियों के रूठे नहीं हैं
अभी ताज महलों के टूटे नहीं है
अभी कंठ लोगों के सहमे पड़े हैं
अभी स्वर बगावत के फूटे नहीं है
कुटियों के दुखदर्द बालिग हुए हैं
महलों की खुशियाँ कुँवारी पड़ी हैं
कोई लूट ले आबरू न सड़क पर
करो हाथ पीले यही शुभ घड़ी है
अगर न हुआ तो ये खतरा रहेगा
गलियों में लोहू का कतरा रहेगा
कुटियों से दूल्हे ये कहके चलेंगे
महलों की खुशियों को जबरन बरेंगे
डोली उठाये किधर जा रहे हैं
अनाड़ी कहारों से ये पूछ लेना ।
:-:- बसंत देशमुख -:-:-
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