पड़े रहे गलियारे में

मथ दूँगा आज कलम से फिर 
फुटपाथों   के  कोलाहल   को 
मैं शिव बनकर खुद पी  लूँगा 
सब निकले हुए  हलाहल  को

लहरों को अभी मना कर दो
जो  बागी  बीच  समुन्दर हैं
पहले  मुझको समझाने  दो
नादान   हठी  दावानल  को

दिन भर की मजदूरी से अब
सुरज का  पेट  न  भरता  है 
हर चूल्हे में अब  शाम  ढले 
कोई   विद्रोह   सुलगता   है

माँ की सूखी छाती  से  जब 
कतरा खून   का  रिसता  है 
नवजातों के जबड़ों  में  तब 
कुछ खूनी दाढ़ निकलता है

चर्चायें कुछ भी हो न सकीं 
उन प्रतिभाओं  के  बारे  में 
लेकर   आभायें  सूरज  की
जो  डूब  गये  अँधियारे  में

लोगों की कुछ  साजिश  थी 
या किस्मत में थी कहीं बदी 
कमरे से  बाहर  भी  निकले 
तो  पड़े  रहे   गलियारे   में


:-:- बसंत देशमुख -:-:-

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