गाँव का ताल वैसे गहरा है

गाँव का ताल  वैसे  गहरा  है 
इसमें पानी है मगर ठहरा है

लोग कहते वहाँ वहाँ है जंगल 
सैर  करने  गये  तो  सहरा  है

तेरी आंखों में हम उतर जाते 
किन्तु शर्मो हया का पहरा है

आज औकात भूल कर अपनी 
एक सागर  के  आगे  डबरा है

धर्म का राजनीति पर साया
मुल्क के टूटने का खतरा  है

चाम तो है सभी की ठठरी पर 
कौन ब्राह्मण है कौन चमरा है।

आँसुओं की नदी  से  क्या  पूछे 
चौक पर क्यों लहू का कतरा है।


:-:- बसंत देशमुख -:-:-

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