अभी भी इन बहारों में ना जाने क्या कमी है
बुलबुल बाग की वीराने में आकर रमी है
मिली है कौन सी पीड़ा विरासत में न जाने
चमन में हर कली की आँख में देखी नमी है
वही आकाश पर कब्जा किए बैठे हुए हैं
जिनके पाँव के नीचे नहीं खुद की जमीं है
बनेगा कौन सा पत्थर यहाँ पर नीँव का ही
भवन गढ़ने से पहले ढूँढ लेना लाजमी है
बहुत से छेद सीने पर मिले हैं बाँसुरी को
तभी तो धुन गले से जो निकलती मातमी है
नियति के सामने होती नहीं औकात कुछ भी
मगर फिर भी हवा में बाँधता पुल आदमी है
-:-:- बसंत देशमुख -:-:-
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