ओढ़कर चिंतक का जामा मसखरा है


ओढ़कर चिंतक का जामा मसखरा है
नर्मदा  सी चाल चलती  खरखरा*  है

सिर  मुड़ाने  को   सभी  तैयार  रहिए
बंदरों  को  मिल  गया अब उस्तरा  है

नींव  तो  डाली  गई  सुंदर  भवन  की
जब  बना  तो  लोग कहते मकबरा  है

गुप्त  हैं   कितने  अजंता    कौन  ढूंढे
हर  जिगर  एक ऐतिहासिक  कंदरा है

अब  ना  कोई  गीत  पर उंगली उठाए
बात   स्थाई   से   कहता     अंतरा   है

हो   मुबारक  सेज  फूलों की जहां   को
हमने  कांटों  पर  बिछाया  बिस्तरा  है

खरखरा - दुर्ग जिले की एक छोटी नदी

 -:-:- बसंत देशमुख -:-:-

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