डबडबायी आँख का आँसू सही हूँ

डबडबायी   आँख  का  आँसू   सही  हूँ 
सूख जाता पर  कभी छलका  नहीं  हूँ 

बनके आँचल शीश को ढंकता रहा हूँ 
यूँ उड़ा हर बार  पर  ढलका  नहीं   हूँ

हमने भी नजदीक से देखी है  दुनिया 
उम्र  लम्बी छोकरा  कल  का  नहीं हूँ

तुम मुझे पी जाओ ये मुमकिन नहीं है 
समुन्दर का  हूँ  जल  नल  का  नहीं हूँ 

मैं  नगीना  ना  सही, कंकड़ रेत का हूँ 
किन्तु कीचड़ ताल के तल का नहीं हूँ

:-:- बसंत देशमुख -:-:-

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