कुछ उसूलों के लिए

डबडबायी आँख के आँसू बिचारे 
सूख जाते हैं कभी छलके नहीं है

हो गये होते कहीं कम 
दर्द लँगड़ी पीढ़ियों के 
यदि बनी बैसाखियाँ 
होती, अलावे सीढ़ियों के

देख सकते दौड़ की प्रतियोगितायें 
लोग ऐसे, पाँव तक जिनके नहीं हैं

क्या बुने वे ख्वाब अब 
मेंहदी, महावर, चूड़ियों के 
जिनके हिस्से में विरासत 
चंद टुकड़े बीड़ियों के

किस तरह उम्मीद को दाना चुगाये 
वादियों में दूर तक तिनके नहीं है

सभ्यता के मापदंडों में
सच बहुत नीचे पड़े हैं
पर न मुद्रा दंडवत की 
तानकर सीना खड़े हैं

मुट्ठियों में कैद इस्पाती इरादे 
क्या हुआ जो जेब में सिक्के नहीं हैं

श्रेय सब उपलब्धियों का 
ले गयी जब हस्त रेखायें 
बाजुओं ने कर लिया संकल्प 
कंधों से उखड़ जाये

डूबना तय है गलत मूल्यांकनों में 
छद्म-समझौतों के हम हिस्से नहीं है

हो सुनहरा कल तुम्हारा
आज फंदों पर टँगे हैं
किन्तु यह क्या हाथ तेरे
खून से किसके रंगे हैं

कुछ उसूलों के लिए हम काम आये
दिग्भ्रमित हो राह में भटके नहीं हैं।


:-:- बसंत देशमुख -:-:-

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