देखकर माहौल घबराये हुए हैं

देखकर   माहौल  घबराये   हुए   हैं
इस शहर में हम नये  आये  हुए  हैं

बोल दें तो आग लग जाये  घरों  में 
दिल में ऐसे राज  दफनाये  हुए   हैं

रोशनी की खोज में मिलता अँधेरा 
हम  हजारों  बार  अजमाये  हुए  हैं

घूरती  नजरों से शिकवे हैं उन्हें जो 
कंचुकी मलमल की सिलवाये हुए हैं

दिन में हैं मूरत बने इन्सानियत के 
रात  में  हैवान  के  साए  हुए  हैं-

जी नहीं पायेंगे  ऐसी  सभ्यता  में 
लोग अपनों से ही अलगाये हुए हैं

गाँव में  जाकर  रहेंगे  यार  अपने 
ये शहर  के  लोग  पगलाये  हुए हैं


:-:- बसंत देशमुख -:-:-

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