शीर्षक नया बदलकर दुहरा रहे कहानी
झरनों से मांगते हैं ज्वालामुखी का लावा
शोलों से मांगते हैं पीने को ठंडा पानी
ढँकते हैं ये बगीचे बारूद के धुएँ से
बंजर को सौंप देते मधुमास की जवानी
मुर्दों को भेंट देते फूलों की मुस्कुराहट
जिन्दों को दे रहे हैं काँटों की जिंदगानी
जिन्दों को दे रहे हैं काँटों की जिंदगानी
सपने हैं सब्ज बाग के मरुथल की झोलियों में
खेतों में गूंजती है फसलों की बेजुबानी
वादा था जिन्दगी को गीतों में ढालने का
हर मौत कह रही है इक अनकही कहानी
:-:- बसंत देशमुख -:-:-
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