दीमकें हैं लगी हुई जड़ में

दीमकें   हैं  लगी   हुई  जड़  में 
पेड़    कैसे   बचेंगे    अंधड़  में-

कौन  सोचेगा  दूसरों  के लिए
सबको अपनी पड़ी है भगदड़ में

सिर्फ हैवानियत की  छाया  है
आदमी का कहाँ है सिर धड़ में

आज निष्ठा चरित्र की बातें 
सूखे पत्ते हैं जैसे पतझड़ में

जिनको सजना था तारों में 
खो गये रास्तों के कंकड़ में-

धुंधली सी किरण आशा की 
शेष अभी अंधकार के गढ़ में-


:-:- बसंत देशमुख -:-:-

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