मित्रों ने बहुत
समझाया था
कुछ कामधाम करो
समझाया था
कुछ कामधाम करो
छोड़कर कविताई
वरना कलम घिसते
रह जाओगे
जिन्दगी भर भाई
चाहे लिख डालो महाग्रन्थ
बच्चों के लिए
जुटा नहीं पाओगे
टूटी हुई झोपड़ी
टूटी चारपाई
मरते समय
कफन मिल जाये
तो गनीमत समझना
इसे किस्सा - गोई नहीं
हकीकत समझना
वरना कलम घिसते
रह जाओगे
जिन्दगी भर भाई
चाहे लिख डालो महाग्रन्थ
बच्चों के लिए
जुटा नहीं पाओगे
टूटी हुई झोपड़ी
टूटी चारपाई
मरते समय
कफन मिल जाये
तो गनीमत समझना
इसे किस्सा - गोई नहीं
हकीकत समझना
पड़ोसी भी कहाँ
जान पाये
कि तुम भी कुछ
लिखते हो तुम कवि जैसे भी
कहाँ दिखते हो
आज से ठीक दो साल पहले
कि तुम भी कुछ
लिखते हो तुम कवि जैसे भी
कहाँ दिखते हो
आज से ठीक दो साल पहले
वे धारण कर
कुरता पायजामा का चोला
बगल में लटकाये बुद्धिजीवियों वाला झोला
सिर्फ चार कवितायें
लेकर घर से निकले थे
आज सारा
हिन्दुस्तान घूम आये हैं
ऐसे में हम क्या करते
उन शारदा के वरद् पुत्रों के
पावन चरण
आज सादर
चूम आये हैं ।
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