ये दिल तो हसरतों का इक मजार हो गया
हँसती हुई बहार में उजड़ा दयार हो गया
हँसती हुई बहार में उजड़ा दयार हो गया
पर्वत थी घाटियाँ थी और जल प्रपात थे-
करवट में एक वक्त की समतल पठार हो गया
करवट में एक वक्त की समतल पठार हो गया
गीतों को कल तलक जहाँ फसलें उगी रही
किसकी नजर लगी मन बंजर कछार हो गया
किसकी नजर लगी मन बंजर कछार हो गया
समझेगा कौन उसके कन्धों के बोझ को-
अपनी दुल्हन के वास्ते जो कहार हो गया
अपनी दुल्हन के वास्ते जो कहार हो गया
:-:- बसंत देशमुख -:-:-
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