राह पथरीली नदी नाले पड़ेंगे

राह  पथरीली  नदी    नाले   पड़ेंगे-
है ये मुमकिन पाँव में छाले  पड़ेंगे

बादलों से चाँदनी धूमिल  पड़ेगी
र तन कुछ धूप में काले पड़ेंगे-

दोस्ती होगी पुराने दुश्मनों से
दोस्तो को जान के लाले पड़ेंगे

ढूँढ़ते हैं  सूर्य में  जो  स्याह  धब्बे
उनकी आँखों मोतिया जाले पड़ेंगे

लिखने जिसने खून को स्याही बनाया 
उस जुबाँ पर क्या कभी ताले  पड़ेंगे

जो छटाको में गरजते घूमते थे- 
आज ढाई  सेर  के  पाले  पड़ेंगे-


:-:- बसंत देशमुख -:-:-

कोई टिप्पणी नहीं: