मेरा दोष क्या है

अंधेरा घिरा है  न  पथ  में  दिया  है 
मैं भटकूँ अगर तो मेरा दोष क्या है

ये झुलसा बदन और बीमार चेहरा 
इन आँखों में ढूँढो कोई राज गहरा 
ये सीने में कैसी सुलगती चिता है 
कोई गीत बनकर निकलता धुआँ है

मंदिर व मस्जिद में भी घूम  आया 
गुनाहों की बस्ती को भी चूम आया 
कोई घाट से प्यास बुझ न सकी  है 
कई घाट  में  जाके  पानी  पिया  है

खिलती कली को सभी ने सराहा 
खुशबू नहीं सिर्फ रंगों  को  चाहा 
खुशबू है बाकी पर मुरझा गया है 
वही फूल गुलदस्ते में रख लिया है

है पेड़ों से फल आज इतने से तोड़े 
न कल के लिए तुमने कुछ भी हैं छोड़े 
पेड़ बूढ़ा हुआ पात भी झर गये  हैं 
इसलिए बीज मैंने नया बो दिया है ।

:-:- बसंत देशमुख -:-:-

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