कस्बे सभी अब शहर हो गये हैं
जहाँ आदमी अब मगर हो गये हैं
हँसी बंदिनी हो गई है कहीं पर
नयन आँसुओं के नगर हो गये हैं
कहाँ पर बसाएँ गीतों की बस्ती
कई गीत अब दरबदर हो गये हैं
पीड़ा तुम्हारी पृष्ठों पर लिखकर
खुद हम किताबों के कभर हो गये हैं
पीढ़ी से कह दो विषपाईयों की
सुकरात मरकर अमर हो गये हैं
छूती थी नभ को जिसकी मीनारें
किले आजकल खंडहर हो गये हैं
-:-:- बसंत देशमुख -:-:-
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