दूर कहीं से जब तुम अपनी गागरिया भर लाती हो
तब फिर क्यों मेरी यादों के तुम पनघट पर आती हो
जिन बागों के फूलों को है हरदम नफरत हरजायी से
उन बागों में रंग बिरंगी तितली बन मँडराती हो
देख शलभ दीपक की लौ में कितने जलकर खाक हुए
ऐसे में खुद दीपक बनकर क्यों इतनी इतराती हो
जान बूझकर उड़ता आँचल सीने से ढलकाती हो
तुम ही जानो तुम हो क्या पर नागिन सी बलखाती हो
जलते हुए मकानों पर क्यों आग तापने आती हो
सब्जबाग की बुलबुल तुम क्यों वीराने में आती हो
पल दो पल का साथ निभाकर क्यों मुझको भरमाती हो
तुम हो पथ के भटके राही क्यों मुझको भटकाती हो
:-:- बसंत देशमुख -:-:-
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