चुभने लगी फूल की पंखुरी

हम  तुम्हारे  खयालों  में  खोये  रहे 
तुम किसी  गैर  को  याद  करते रहे

तेरा चेहरा था  ऐसा  दमकता  हुआ 
मैंने हँस करके  तुमको सबेरा  कहा 
तुम तो ऊपर ही ऊपर थिरकते  रहे 
मन के आँगन में हरदम अँधेरा रहा

दिल का दीपक जलाकर उजाला किए 
हम खड़े ही रहे  अश्रु  माला  लिए 
तेरा आँचल हवाओं में उड़ता रहा 
धूल  में  मेरे  आँसू  बिखरते  रहे

दूर के ढोल अब तो सुहाने लगे 
पास की बाँसुरी हो गयी बेसुरी 
मेरी राहों में पलकें बिछाना नहीं 
मुझको चुभने लगी फूल की पंखुरी

हम  हमेशा  नये  दर्द  ढोते  रहे 
तुम तो धागों में मोती पिरोते रहे 
प्यार की भीख अधरों को मिल न सकी 
माँग अधरों की गीतों से भरते रहे

तेरी आँखों में काजल बिहँसता रहा 
मेरी आँखों के गीले किनारे रहे 
मेरे पहलू में रातें सिसकती रही 
तेरे पहलू में हँसते सितारे रहे

हम तो सुर ताल तुमसे मिलाते रहे 
अपनी डफली अलग तुम बजाते रहे 
हम तो आजाद होकर भी घुटते रहे 
मुक्त हो तुम कफस में विचरते रहे


:-:- बसंत देशमुख -:-:-

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