कोई नहीं बता सकता अब
बात कहाँ तक बढ़ जायेगी
बात कहाँ तक बढ़ जायेगी
पहले अक्षर अक्षर उलझे
अब शब्दों में मन मुटाव है
कथनी और क्रिया में अंतर
कर्ता का अटपट स्वभाव है
अब शब्दों में मन मुटाव है
कथनी और क्रिया में अंतर
कर्ता का अटपट स्वभाव है
क्या सब सृजन व्यर्थ ही होगा
पंक्ति पंक्ति से लड़ जायेगी
पंक्ति पंक्ति से लड़ जायेगी
खींची है सब सम रेखायें
लेकिन विषम त्रिकोण हो गये
सत्ता की लिप्सा के आगे
सभी प्रश्न फिर गौण हो गये
लेकिन विषम त्रिकोण हो गये
सत्ता की लिप्सा के आगे
सभी प्रश्न फिर गौण हो गये
क्या स्वारथ की भागदौड़ में
इन्सानियत पिछड़ जायेगी
इन्सानियत पिछड़ जायेगी
अंधे राह दिखाने वाले
लूलों के हाथों मशाल है
लूलों के हाथों मशाल है
साथी है जयचंद सरीखे
षड़यंत्रों का बिछा जाल है
क्या लंगड़ों की अगुवायी में
भीड़ चढ़ाई चढ़ जायेगी ।
भीड़ चढ़ाई चढ़ जायेगी ।
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