गर्भ में रात के अंधेरा है

गर्भ  में  रात  के  अंधेरा  है
कौन कहता है कि सबेरा है

चेहरे   पर  पुता   अँधेरा  है
कैसे  माने   इसे   सबेरा  है

साधकर एक मंत्र बिच्छू का 
एक   ढोंगी   बना   सपेरा है

जाल में फॅसके एक मछली के
लापता   गाँव  का   मछेरा  है

ज़ख्म सीने में अश्क, आँखों में
होंठ  पर   गीत  का   बसेरा   है

गीत की धड़कनों में हलचल है
कोई सरगम किसी  ने  टेरा  है

कितने सपने हसीन आंखों के
वक्त   ने  धूल    में   बिखेरा है

ये गजल आपकी अमानत है 
शब्द   मेरे  हैं   दर्द   तेरा   है

रिश्ते  नाते  सभी  छलावे  हैं 
जग तो यायावरों  का डेरा  है


:-:- बसंत देशमुख -:-:-

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