सोचते थे मर्ज है सुधार में

सोचते  थे  मर्ज  है  सुधार  में
सन्नपात  है  हुआ  बुखार  में

दर्द को खरीदकर नगद नगद
ढूंढते    दवाइयां    उधार    में

सपनों के  सोमनाथ   तोड़कर
दिन पड़े हैं गजनवी खुमार में

घर के  ही  रहे ना और घाट के
लाड़ले  बिगड़  गए  दुलार   में

यादों के  इन्द्रधनुष  तन  गए
देख  धूप  भीगती    फुहार  में

कामदेव एव  मस्त  कह  गए
स्वान बने  हैं  कुंवर कुँआर में

चढ़ गए थे  दौड़कर  ऊँचाइयाँ
पाँव  डगमगा  गए  उतार   में

 -:-:- बसंत देशमुख -:-:-

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