नदी किनारे बाढ़ का डर है, बंजर हर मैदान है
बोलो बीज कहाँ प र बोयें, पूछ रहा ये किसान है ।
कल तक था जो धान कटोरा
अब एक फूटा दोना है
अब एक फूटा दोना है
खेत खार सब बाँझ पड़े हैं
ये किस का जादू टोना है
ये किस का जादू टोना है
खेती ही है धरम हमारा
मिहनत अपना फर्ज है
हम कोल्हू के बैल हो गये
उतर न पाता कर्ज है।
खेत पसीने से भींगे हैं, आँसू से खलिहान है ।
खेत हुए वीरान गाँव के
अब खलिहान भिखारी हैं
शहरों के बंगलों में बैठी
मुसकाती फुलवारी है ।
अब खलिहान भिखारी हैं
शहरों के बंगलों में बैठी
मुसकाती फुलवारी है ।
आशायें बेरोजगार हैं
स्वप्न हुए हैं धुआँधुआँ
बस्ती में वे आग लगाकर
खोद रहे हैं नया कुँआ ।
स्वप्न हुए हैं धुआँधुआँ
बस्ती में वे आग लगाकर
खोद रहे हैं नया कुँआ ।
अंतस की पीड़ा कहने को, खुलती नहीं जुबान है ।
श्रम की गंगा बही यहाँ पर
कदम कदम पर तीरथ है
डुबकी लेने रहा तरसता
लेकिन स्वयं भगीरथ है।
घाट घाट पर लूट मची है
पंडों की निगरानी में
पापी कालिख घोल रहे हैं
गंगा जी के पानी में ।
आहुति देकर सदाचार की, यज्ञ करत बेइमान हैं ।
भ्रष्टाचार पनपते देखा
आजादी के आँगन में
नागफनी फन काढ़े बैठी
नन्दन वन से कानन में ।
खींचातानी देखी
हमने सत्ता के गलियारे में
नैतिकता नीलाम हो गयी
सुविधा के बटवारे में
अन्तरिक्ष में घूम घामकर, सिर धुनता विज्ञान है ।
:-:- बसंत देशमुख -:-:-
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें